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PM मोदी, पुतिन और जिनपिंग के साथ दिखे सिद्धार्थ बाबू कौन हैं? UPSC में 15वीं रैंक के बाद चुना IFS, अब निभाते हैं डिप्लोमैटिक इंटरप्रेटर की भूमिका

नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक तस्वीर सामने आई, जिसमें एक भारतीय अधिकारी भी तीनों नेताओं के बेहद करीब नजर आए। तस्वीर सामने आने के बाद इस अधिकारी को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई। यह अधिकारी हैं सिद्धार्थ बाबू, जो 2017 बैच के Indian Foreign Service (IFS) अधिकारी हैं।

सिद्धार्थ बाबू को प्रधानमंत्री मोदी के साथ कई अहम अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में डिप्लोमैटिक इंटरप्रेटर की भूमिका में देखा गया है। BRICS Summit के दौरान भी वह विदेशी नेताओं के साथ प्रधानमंत्री की बातचीत में भाषा से जुड़ी जिम्मेदारी संभालते नजर आए। उनकी मौजूदगी इसलिए भी खास है क्योंकि उच्चस्तरीय राजनयिक बैठकों में इंटरप्रेटर का काम सिर्फ एक भाषा को दूसरी भाषा में बदलना नहीं होता। बातचीत के शब्द, संदर्भ और लहजे को सही तरीके से सामने रखना भी इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

कौन हैं सिद्धार्थ बाबू?

सिद्धार्थ बाबू मूल रूप से केरल के कोच्चि से हैं। उनकी पढ़ाई का शुरुआती रास्ता डिप्लोमेसी से नहीं जुड़ा था। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में निजी क्षेत्र में भी काम किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने ई-कॉमर्स सेक्टर में भी काम किया था। इसके बाद उनकी रुचि अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति की तरफ बढ़ी।

उन्होंने UPSC Civil Services Examination की तैयारी शुरू की। पहली कोशिश में सफलता नहीं मिली, लेकिन इसके बाद उन्होंने अपनी तैयारी को दोबारा व्यवस्थित किया। 2016 की Civil Services Examination में उन्हें All India Rank 15 मिली। यह रैंक उन्हें IAS जैसी सेवा चुनने का मौका दे सकती थी, लेकिन उन्होंने अपनी रुचि के मुताबिक Indian Foreign Service को चुना।

UPSC में 15वीं रैंक, फिर भी IAS की जगह IFS क्यों चुना?

सिद्धार्थ बाबू की कहानी में सबसे ज्यादा चर्चा उनके UPSC रैंक और सेवा के चुनाव को लेकर होती है। आम तौर पर Civil Services Examination में बहुत अच्छी रैंक हासिल करने वाले उम्मीदवारों के लिए IAS सबसे पसंदीदा विकल्पों में शामिल रहता है। सिद्धार्थ बाबू ने हालांकि अलग रास्ता चुना।

उनकी दिलचस्पी International Relations में थी। इसी वजह से उन्होंने ऐसी सेवा चुनने का फैसला किया जिसमें दूसरे देशों के साथ भारत के संबंधों, विदेश नीति और कूटनीति से जुड़े काम करने का अवसर मिलता है। UPSC से जुड़ी उपलब्ध सामग्री में भी उन्होंने बताया था कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उनकी रुचि थी और उन्हें लगा कि करियर डिप्लोमैट के रूप में काम करना उनके लिए इस क्षेत्र में काम करने का उपयुक्त रास्ता है।

उनके लिए IFS का चुनाव सिर्फ एक सरकारी नौकरी का फैसला नहीं था। अंतरराष्ट्रीय मामलों में रुचि और भारत की विदेश नीति से जुड़े काम करने की इच्छा इस फैसले के पीछे अहम वजह रही। इसी कारण UPSC में शानदार रैंक आने के बावजूद उन्होंने अपनी पसंद की सेवा को प्राथमिकता दी।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग से कूटनीति तक का सफर

सिद्धार्थ बाबू का करियर यह भी दिखाता है कि Civil Services में आने वाले सभी उम्मीदवार सीधे प्रशासन या राजनीति से जुड़े विषयों की पढ़ाई करके नहीं आते। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि मैकेनिकल इंजीनियरिंग की है। इंजीनियरिंग के बाद उन्होंने निजी क्षेत्र में काम किया और फिर UPSC की तरफ कदम बढ़ाया।

उनकी तैयारी में International Relations की खास भूमिका रही। UPSC 2016 में उनका ऑप्शनल विषय भी International Relations बताया गया है। विदेश नीति और वैश्विक घटनाओं में रुचि धीरे-धीरे उनके करियर का मुख्य हिस्सा बन गई।

2017 बैच में IFS में शामिल होने के बाद उनके सामने एक अलग तरह का काम था। विदेश सेवा के अधिकारियों को अलग-अलग देशों के साथ भारत के संबंधों, भाषा, संस्कृति और राजनयिक प्रक्रियाओं की समझ विकसित करनी होती है। आगे चलकर यही अनुभव उनके काम में दिखाई दिया।

बीजिंग में भी कर चुके हैं काम

सिद्धार्थ बाबू के करियर में चीन से जुड़ा अनुभव भी महत्वपूर्ण रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने 2018 से 2022 के बीच बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास में काम किया। इस दौरान उन्होंने Third Secretary और Second Secretary के रूप में जिम्मेदारियां संभालीं।

बीजिंग में तैनाती ने उन्हें चीन से जुड़े मामलों को करीब से समझने का अवसर दिया। भारत और चीन के रिश्ते कूटनीतिक स्तर पर बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। ऐसे माहौल में भाषा और बातचीत की सही समझ का महत्व और बढ़ जाता है।

चीन में काम करने के अनुभव के साथ उनकी भाषा संबंधी क्षमता भी उनके राजनयिक काम का अहम हिस्सा बनी। यही वजह है कि बाद में उन्हें प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण विदेशी बैठकों में इंटरप्रेटर के तौर पर भी देखा गया।

अमेरिका में भी निभाई जिम्मेदारी

बीजिंग में काम करने के बाद सिद्धार्थ बाबू ने अमेरिका में भी जिम्मेदारी संभाली। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक 2022 से 2024 के बीच उन्होंने कैलिफोर्निया के मोंटेरे क्षेत्र में Consul के रूप में काम किया।

इस दौरान उनका काम भारत और अमेरिका से जुड़े कांसुलर तथा राजनयिक मामलों से जुड़ा रहा। विदेश सेवा के अधिकारियों के लिए अलग-अलग देशों में काम करने का अनुभव आगे की जिम्मेदारियों में काफी उपयोगी होता है। सिद्धार्थ बाबू के मामले में भी चीन और अमेरिका जैसे महत्वपूर्ण देशों में काम करने का अनुभव उनके मौजूदा राजनयिक काम से जुड़ा दिखाई देता है।

विदेश मंत्रालय में क्या जिम्मेदारी है?

विदेशी तैनाती के बाद सिद्धार्थ बाबू नई दिल्ली स्थित विदेश मंत्रालय में लौटे। हाल की रिपोर्टों में उन्हें विदेश मंत्रालय में Deputy Secretary के रूप में बताया गया है और उनका काम Europe और Eurasia से जुड़े मामलों से जुड़ा है।

यह जिम्मेदारी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत के यूरोप, रूस और यूरेशिया क्षेत्र के कई देशों के साथ लगातार राजनयिक संपर्क होते हैं। BRICS जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर रूस समेत कई देशों के नेताओं के साथ बातचीत के दौरान क्षेत्र से जुड़े मामलों की जानकारी रखने वाले अधिकारियों की भूमिका स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।

हालांकि, किसी बड़े कार्यक्रम में किसी अधिकारी की मौजूदगी का मतलब यह नहीं होता कि वही अधिकारी बैठक के सभी विषयों को अकेले संभाल रहा है। विदेश मंत्रालय में अलग-अलग अधिकारी अपनी विशेषज्ञता और जिम्मेदारी के अनुसार प्रधानमंत्री तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को सहायता देते हैं।

PM मोदी के साथ इंटरप्रेटर के रूप में क्यों दिखते हैं?

प्रधानमंत्री और किसी विदेशी नेता के बीच बातचीत के दौरान इंटरप्रेटर की भूमिका काफी संवेदनशील होती है। खासकर जब बातचीत राष्ट्राध्यक्षों या सरकार के प्रमुखों के बीच हो रही हो, तब सिर्फ शब्दों का अनुवाद पर्याप्त नहीं होता। बोलने वाले का लहजा, संदर्भ और बात का वास्तविक अर्थ भी उसी तरह दूसरी भाषा में पहुंचाना होता है।

सिद्धार्थ बाबू को इसी तरह की जिम्मेदारी निभाते हुए प्रधानमंत्री मोदी के साथ कई महत्वपूर्ण मौकों पर देखा गया है। BRICS Summit की तस्वीर में उनकी मौजूदगी ने लोगों का ध्यान इसलिए खींचा क्योंकि वह मोदी, पुतिन और जिनपिंग के बीच खड़े दिखाई दिए।

इंटरप्रेटर को बातचीत के दौरान बहुत तेजी से काम करना पड़ता है। कई बार नेता एक के बाद एक बातें रखते हैं और उसी समय उनका सही अर्थ दूसरी भाषा में पहुंचाना होता है। कूटनीतिक बातचीत में एक शब्द का संदर्भ बदलने से बात का मतलब भी बदल सकता है। इसलिए इस काम के लिए भाषा की जानकारी के साथ राजनयिक विषयों की समझ भी जरूरी होती है।

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इंटरप्रेटर का काम सिर्फ अनुवाद करना नहीं

आम बातचीत में अनुवाद का मतलब एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा में बदलना माना जाता है। लेकिन राजनयिक इंटरप्रेटर का काम इससे काफी अलग होता है। उन्हें बातचीत का संदर्भ समझना पड़ता है और यह ध्यान रखना होता है कि मूल बात का अर्थ और लहजा सही रूप में सामने आए।

  • नेताओं की बातचीत को सही अर्थ के साथ दूसरी भाषा में पहुंचाना।
  • राजनयिक शब्दों और अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़े संदर्भ को समझना।
  • बातचीत के दौरान भाषा और लहजे को बनाए रखना।
  • संवेदनशील बातचीत में गोपनीयता और पेशेवर जिम्मेदारी का पालन करना।

इसी वजह से शीर्ष नेताओं के साथ काम करने वाले इंटरप्रेटर आमतौर पर प्रशिक्षित और अनुभवी अधिकारी होते हैं। सिद्धार्थ बाबू की IFS पृष्ठभूमि इस जिम्मेदारी को समझने में महत्वपूर्ण है।

Republic Day कार्यक्रम में भी दिखे थे

Republic Day कार्यक्रम में भी दिखे थे
Republic Day कार्यक्रम में भी दिखे थे

BRICS Summit से पहले भी सिद्धार्थ बाबू की तस्वीरें और वीडियो सामने आ चुके हैं। 2026 के Republic Day कार्यक्रम के दौरान उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के साथ देखा गया था, जहां उन्होंने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष Ursula von der Leyen के साथ बातचीत में इंटरप्रेटर की भूमिका निभाई थी।

इसके बाद BRICS Summit में प्रधानमंत्री के साथ उनकी मौजूदगी ने एक बार फिर लोगों का ध्यान खींचा। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों के बाद बड़ी संख्या में लोग यह जानने की कोशिश करने लगे कि प्रधानमंत्री के पास खड़े इस अधिकारी का नाम क्या है और वह क्या काम करते हैं।

सिद्धार्थ बाबू की UPSC यात्रा

सिद्धार्थ बाबू की UPSC यात्रा भी उनके करियर का अहम हिस्सा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उन्होंने पहले प्रयास में Civil Services Examination पास नहीं किया था। इसके बाद उन्होंने तैयारी के तरीके पर दोबारा काम किया और दूसरे प्रयास में बेहतर प्रदर्शन किया।

2016 की परीक्षा में उन्हें All India Rank 15 मिली। इस सफलता के बाद उन्होंने IFS को चुना। उनकी UPSC तैयारी से जुड़ी एक उपलब्ध सामग्री में उन्होंने तैयारी के लिए करीब 12 महीने की गंभीर मेहनत को पर्याप्त मानने की बात कही थी, बशर्ते तैयारी नियमित और सही तरीके से की जाए।

उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय परिवार, दोस्तों, शिक्षकों और मार्गदर्शकों से मिले सहयोग को भी दिया था। International Relations और सुरक्षा से जुड़े विषयों पर वीडियो और डॉक्यूमेंट्री देखना तथा पूर्व राजनयिकों के अनुभव सुनना भी उनकी तैयारी का हिस्सा रहा।

सिद्धार्थ बाबू के करियर की प्रमुख बातें

विषयजानकारी
नामसिद्धार्थ बाबू
सेवाIndian Foreign Service (IFS)
बैच2017
शहरकोच्चि, केरल
शैक्षणिक पृष्ठभूमिमैकेनिकल इंजीनियरिंग
UPSC परीक्षाCivil Services Examination 2016
All India Rank15
पसंदीदा सेवाIndian Foreign Service
बीजिंग में तैनाती2018 से 2022 के बीच
अमेरिका में जिम्मेदारी2022 से 2024 के बीच कैलिफोर्निया में Consul
वर्तमान भूमिकाविदेश मंत्रालय में Deputy Secretary से जुड़ी जिम्मेदारी
BRICS में भूमिकाप्रधानमंत्री के साथ डिप्लोमैटिक इंटरप्रेटर के रूप में मौजूदगी

डिप्लोमैटिक इंटरप्रेटर की भूमिका कितनी अलग है?

प्रधानमंत्री की विदेशी यात्राओं और दूसरे देशों के नेताओं के साथ बैठकों में इंटरप्रेटर पर्दे के पीछे काम करने वाले उन अधिकारियों में शामिल होते हैं जिनकी जिम्मेदारी बातचीत को सही तरीके से आगे बढ़ाने की होती है। जनता का ध्यान आमतौर पर नेताओं पर रहता है, लेकिन बातचीत के दौरान भाषा से जुड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी भी पूरी प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा होते हैं।

ऐसे अधिकारियों को कई तरह के विषयों की जानकारी रखनी पड़ सकती है। विदेश नीति, व्यापार, सुरक्षा, तकनीक, क्षेत्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़े शब्द बातचीत में आ सकते हैं। इसलिए सिर्फ किसी विदेशी भाषा को बोल पाना इस काम के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता। विषय और कूटनीतिक संदर्भ को समझना भी जरूरी है।

सिद्धार्थ बाबू का चीन में काम करने का अनुभव और International Relations में उनकी रुचि उनके मौजूदा काम से जुड़ती है। यही वजह है कि उन्हें प्रधानमंत्री के साथ महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय बैठकों में देखा गया है। हालांकि किसी विशेष बैठक में उनकी जिम्मेदारी कितनी व्यापक थी, इसकी पूरी जानकारी हर बार सार्वजनिक नहीं होती।

पहले भी ऐसे अधिकारी PM के साथ नजर आते रहे हैं

सिद्धार्थ बाबू ऐसे पहले अधिकारी नहीं हैं जिन्हें प्रधानमंत्री के साथ विदेशी नेताओं की बातचीत के दौरान इंटरप्रेटर के रूप में देखा गया हो। भारत की कूटनीति में भाषा विशेषज्ञों और इंटरप्रेटरों की भूमिका लंबे समय से रही है। इनमें Nilakshi Saha Sinha का नाम भी शामिल है।

Nilakshi Saha Sinha फ्रेंच भाषा की विशेषज्ञ हैं। विदेश मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उन्होंने अक्टूबर 2014 से फरवरी 2022 तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के Interpreter के रूप में काम किया। बाद में उन्हें 2023 में भारत का Armenia में Ambassador नियुक्त किया गया।

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से French में MA किया था और विदेश मंत्रालय में लंबे समय तक अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं। 29 मार्च 2023 को उन्होंने Armenia में भारत के Ambassador के रूप में कार्यभार संभाला।

Nilakshi Saha Sinha का राजनयिक करियर

Nilakshi Saha Sinha का राजनयिक करियर
Nilakshi Saha Sinha का राजनयिक करियर

Nilakshi Saha Sinha 1993 में विदेश मंत्रालय से जुड़ी थीं। उन्होंने पेरिस में भारत के मिशन में भी काम किया और विदेश मंत्रालय की अलग-अलग डिवीजन में जिम्मेदारियां निभाईं। French भाषा पर उनकी मजबूत पकड़ के कारण उन्हें प्रधानमंत्री के साथ Interpreter की भूमिका मिली।

2023 में Armenia के Ambassador के रूप में उनकी नियुक्ति भी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है। Armenia के राष्ट्रपति कार्यालय ने अप्रैल 2023 में उनके credentials पेश किए जाने की जानकारी जारी की थी।

BRICS की तस्वीर में सिद्धार्थ बाबू की मौजूदगी क्यों चर्चा में आई?

BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति जिनपिंग की तस्वीर तेजी से चर्चा में आई। तस्वीर में नेताओं के साथ खड़े सिद्धार्थ बाबू की मौजूदगी ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। इसके बाद उनकी UPSC रैंक, IFS सेवा और विदेश मंत्रालय में जिम्मेदारी से जुड़ी जानकारी सामने आने लगी।

इस तस्वीर को देखने वाले कई लोगों के लिए वह एक अनजान चेहरा थे। लेकिन विदेश सेवा के जानकारों के लिए उनका काम उस व्यवस्था का हिस्सा है जिसमें शीर्ष स्तर की बैठकों के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ अधिकारी प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय को सहायता देते हैं।

सिद्धार्थ बाबू का मामला इसलिए भी अलग नजर आता है क्योंकि उन्होंने UPSC में 15वीं रैंक हासिल करने के बाद IAS की जगह IFS चुना और आगे चलकर भाषा तथा कूटनीति से जुड़े काम में अपनी जगह बनाई। Mechanical Engineering से शुरुआत करने के बाद International Relations में रुचि और विदेश सेवा तक पहुंचने का उनका सफर भी उनके करियर की खास बात है।

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Latest Update

सितंबर 2026 में नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ सामने आई तस्वीर के बाद सिद्धार्थ बाबू फिर चर्चा में हैं। वह 2017 बैच के IFS अधिकारी हैं और हाल की रिपोर्टों में उन्हें विदेश मंत्रालय में Europe और Eurasia से जुड़े काम के लिए Deputy Secretary बताया गया है। Summit के दौरान उन्हें प्रधानमंत्री के डिप्लोमैटिक इंटरप्रेटर के रूप में देखा गया।

उनकी पहचान अब सिर्फ वायरल तस्वीर में नजर आए अधिकारी के तौर पर नहीं, बल्कि UPSC में All India Rank 15 हासिल करने वाले और अपनी पसंद से IFS चुनने वाले राजनयिक के रूप में सामने आई है।

Ravi Singh

Written by Ravi Singh

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